गजर घास
खिसयानी बिल्लीअब क्यो! खम्बा नोच रही है
इस लोकपाल मे! सबकी अपनी सोच रही है
क्यो! बाप छोड़कर चले गये,ये पछतावा है
तुम तो बस, चिन्गारी थे अन्ना लावा है
अह!कार मे! घर से निकलो बदनामी है
फटी ल!गोटी बडे़ आदमी की दामी है
आम आदमी बनकर अब तुम खास हो गये
जिसने छोडा बाप ,सभी उपहास हो गये
लोकपाल मे! अब क्यो! कमिया! ढू!ढ रहे हो
इस जनता पर रहम करो क्यो! मू!ड रहे हो
अच्छी खासी छोड़ चाकरी डाकु पकडे़
कविराज षिक्षक थे अब सडको पर अकडे़
कुछ पत्रकार थे सम्मानित थे कुद पडे़थे
ये राजनीति की लाइन मे! चुपचाप खडे़थे
क!ही बीजेपी,क!ही का!ग्रेस,क!ही ,कू!आ खायी
धरी रह गयी च!चल मन की सब चतुरायी
सरकार बनाने निकले थे ,सरकार बनाओ
सर आ!खो! पर रखा था अब ठोकर खाओ
पहले जनमत मा!गा था,अब चिटठी,पत्री
ये सूनामी है ,काम नही आयेगी छतरी
जब अन्ना को छोडा था, जनता से पूछा
जब राजनीति मे! आये,क्या जनता से पूछा
जब आप पार्टी बने स्वय! ,जनता से पूछा
जब राश्ट्रपति से मिले थे क्या जनता से पूछा
का!ग्रेस ,बी. जे. पी. को, क्यो! चिटठी डाली
क्या जनता से पूछी थी करतूते! काली
गले मे! हड्डी फ!सी पडी है क्यो! रोते हो
क्यो! तर्को औेर कूतर्को से गरिमा खोते हो
नवजात षिषू हो ,घर मे! बैठो निप्पल चूसो
राजनीति के ग्रास, गले मे! और ना ठूसो
बची,खुची इज्जत और अपनी लाज बचाओ
तुम हार गये हो,मौन रहो ,ना झे!प मिटाओ
बुनियादो! क े बिना भवन खुद गिर जाते है!
मजबूत जडो! के वृक्ष हमेषा लहराते है!
अब राजनीति मे! आये ,हो बुनियादे! डालो
कवि ‘आग’ कहता है,ये विशधर मत पालो!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
ऋशिकेष
मो09897399815
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