संसदवाणी: कौन आम, खास कौन? बिहार बिक रहा है
हे बिहार के पासवान, हे राजनीति के नाषवान
हे लावारिस राश्ट्र-गान, हे अवसर-वादी पहलवान
हे सत्तादल के माल छान,हे लक्ष्य-भेद तरकस कमान
हे कटे वस्त्र के फटे थान,हे भीमराव के गुप्त-दान
हे राजनीति,दुर्गन्ध द्वन्द,हे अगडे़,पिछडे़मतिमन्द
हे धरती मे! दबे अन्ध,अपषिश्ट धरा के सडे़कन्द
हे तुकबन्दी के अन्ध बन्द,हे छपरा के छगन छन्द
उलझी सत्ता मे!पडे़फन्द,हे नन्द व!ष के घनानन्द
हे राजनीति के बैसाखी, हे र!ग-म!च नृतक राखी
तू फटे दुध की हैे माखी,हे सत्ता के चम-चम चाखी
हे अगडे़पिछडो! की झा!की,nहे खादी मे!व्याधी खाकी
हे हरिजन, दुर्जन के पाखी, हे सुरा-सुन्दरी के साखी
हे लालू नीतीष के सिर दर्दी,हे राहुल, मोदी हमदर्दी
हे आसमान, गुण्डागर्दी, अब राम लला की है वर्दी
तूने सत्ता मे! हद करदी,अब राजनीति पूरी चरदी
तू हरदी मे! भी है जरदी, नयी-नयी नसल पैदा करदी
तू जोकर भी कि!ग मेकर है, लालू का केयर टेकर है
आर.आर.एस की नेकर है,क!ही ब्रोकर है,क!ही ब्रेकर है
ये राजनीति ही गन्दी है, तू इसमे! पडा फुफन्दी है
कवि ‘आग ’ की भाशा मे!,बस, तू आवारा नन्दी हेै!!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग

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