Wednesday, 26 February 2014

संसदवाणी: कौन आम, खास कौन?

संसदवाणी: कौन आम, खास कौन?


संसद की लाचारी
पुरातत्व के मानचित्र मे मंेैइस दुनिया का जनपद हॅूं
चैराहे  पर   हाॅंप   रहा  हॅूं  मंे  भारत   की   संसद हॅूं
मैने मुगलों  को  देखा  था  मान  नही  अपना  खोया 
अंग्रेजों  के  अंकुष  के  नीचे   भी  दबा  नही  रोया 
आजाद हुआ निर्पेक्ष बना मंे काॅप रहा वो गणपद हूॅं
चैराहे  पर    हाॅंप   रहा  हॅूं  मैं  भारत   का  संसद हॅूं

गाॅंधी, नेहरू,लाल  बहादुर  की  मर्यादा  को देखा
हर विरोध की सीमाओं मंे  खींची  प्यार की थी रेखा
सत्ता और विरोधो  में भी कीचढ  नही  उछलता था
तर्को  और  कूतर्कों से  केवल भारत  ही  पलता था
उन्ही दिनो की यादों में षिखरों से गिरता हिमनद हॅूं
चैराहे  पर  हाॅंप   रहा  हॅूं   मैे  भारत  का    संसद हॅूं

आजादी  के साथ-साथ   अब   अपराधी  भी आतें है
देख  रहा   हॅूं  भ्रश्टाचारी ,कैसे   षोर   मचाते हैं
गुत्थम  गुत्था  में  ये मेरे  मेरूदण्ड  को  तोड रहे है
लोकतन्त्र की लोक-लाज को अय्यासी पर मोड रहे हैं
लाचारी  मंे  देख   रहा   हॅूं, नेता   से   छोटा   कद हॅूं
चैराहे  पर   हाॅंप   रहा   हॅूं  मैे  भारत  का   संसद हॅूं

पक्षों  और  विपक्षों का  सम्मान  सदा  मंे  पाता था
गौरवषाली  भारत   का  इतिहास   जगत  मंे गाता था
भ्रश्टाचारी ,वैभवषाली   की   कुण्ठा   से   रोता हॅूं
लोक सभा हो राज्य सभा हो आज  प्रतिश्ठा खोता हॅूं
सत्य,अहिंसा का प्रतिपालक  आज  लुटेरों  का मद हॅूं
चैराहे  पर  हाॅंप   रहा   हॅूं, मैे   भारत    का  संसद हॅूं

गुरूग्रन्थ  गीता ,रामायण  और  कूरान  बुनियादें थी
सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग की भी सारी यादें थी
सम्प्रदाय निर्पेक्ष राश्ट्र हो ऐसा नियम  बनाया था
चक्रव्रती   सम्राटों  ने    आदर्ष   यहीं से  पाया था
मैं भारत  का  जटाजूट   हॅूं  कल्प  वृक्ष  हॅूं  बरगद हॅूं
चैराहे  पर   हाॅंप   रहा   हॅूं  मैे   भारत   का   संसद हॅूं

भगत सिंह षेखर,सूभाश  की  आषाओं मंे खडा हुआ
भारत  भंजन  करने  वालों  के  चरणों मंे पडा हुआ
राजनीति के कीचढ मे!उस प!कज को खोज रहा हॅू
राम राज्य मेंभारत  माता  जैसी  सीता सोच रहा हॅूं
धर्म कर्म की इस धरती मंे पुनः धर्म का धम्पद हूॅ
चैराहे   पर   हाॅंप   रहा  हॅूं  मंै  भारत  का  संसद हॅूं

संविधान की धाराओंको सबके उपर फे!क रहा हॅूं
संसद  की  कुर्सी पर बैठे अपराधी मैं देख  रहा हॅूं
क्यों होती है आज मंत्रणा,डाकू,चोर चकारों में
स!विधान की देख नुमाइस,आज खुले  बाजारोंमें
चीर-हरण  होता है  मेरा सिद्या!त की  सरहद हॅूं
चैराहे  पर  हाॅंप  रहा  हॅूं मैे  भारत  का  संसद हॅूं
फिर से कोई क्या मुझको सम्मान दिलाने आयेगा
फिर से कोई आर्यखण्ड की लाज बचाने आयेगा
मै!निराष हू!देख-देख कर डेढ़अरब की भीडो!को
सभी परिन्दे मौेन खडे़ है! देख के अपने नीडो!को
मै कवि‘आग’हू!,रावण के दरबार खडा हू!अ!गद हू!
चैराहे  पर  हाॅंप  रहा  हॅूं मैे भारत  का  संसद हॅूं ।।

 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)मो0 9897399815

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